Wednesday, July 6, 2022

शलभासन के फायदे, तरीका, लाभ और नुकसान

Shalabhasana Aka Locust pose Benefits-

 

शलभासन (Locust pose) के फायदे नुकसान- शलभासन एक प्राचीन योग मुद्रा है, जो शरीर की कई महत्वपूर्ण मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और साथ ही कई स्वास्थ्य रोगों का इलाज करता है।

 

शलभासन एक प्राचीन योग मुद्रा है, जिसका नाम शलभ और आसन दो शब्दों से मिलकर बना है। यह योगाभ्यास करने के दौरान शरीर की आकृति शलभ (एक प्रकार का कीट) के समान दिखाई पड़ती है, जिसके अनुसार इस योग मुद्रा का नाम पड़ा। अंग्रेजी में शलभासन कोलोकस्ट पोज” (Locust pose) के नाम से जाना जाता है। यह योगासन शुरुआती अभ्यासकर्ताओं के लिए काफी प्रभावी माना जाता है, जिसकी मदद से पीठ रीढ़ की हड्डी में लचीलता बढ़ती और साथ ही पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शुरुआत में शलभासन करने में थोड़ी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, अभ्यास की मदद से इसे सही तकनीक के साथ करने में सफलता मिल सकती है। आज इस लेख में हम शलभासन से मिलने वाले स्वास्थ्य लाभों को जानेंगे और साथ में यह भी जानकारी लेंगे कि इसका अभ्यास करने का सही तरीका क्या है।

 

शलभासन के लाभ (Benefits of Locust pose)

 

शलभासन प्रमुख रूप से पीठ में मौजूद मांसपेशियों हड्डियों को मजबूत बनाता है और उनमें लचीलता लाता है। शलभासन से मिलने वाले प्रमुख लाभों में निम्न शामिल है -

1.      मांसपेशियों को मजबूत लचीला बनाए शलभासन

इस योग क्रिया को शरीर की कई मांसपेशियों के लिए लाभदायक माना जाता है। इशें पीठ, जांघ, सीने और कोर मांसपेशियां शामिल हैं।

2.      शारीरिक मुद्रा को सुधारे शलभासन

शलभासन को ऐसी योग मुद्राओं में शामिल किया जाता है, जिन्हें करने के लिए संतुलन की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही इससे कोर मांसपेशियां मजबूत बनती है और शारीरिक संतुलन मुद्रा दोनों में सुधार होता है।

3.      पाचन क्रिया को तेज करे शलभासन

शलभासन के दौरान पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आता है और साथ ही पेट के अंदर के अंग भी उत्तेजित हो जाते हैं और पाचन क्रिया को तेज करने में मदद मिलती है।

4.      मानसिक रोगों को दूर करे शलभासन

शलभासन योग मुद्रा सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य में ही सुधार नहीं करती है, बल्कि इससे मानसिक स्वास्थ्य में भी काफी सुधार होता है। नियमित रूप से शलभासन अभ्यास करने से डिप्रेशन, चिंता, तनाव और अनिद्रा जैसी स्थितियों का इलाज किया जा सकता है।

 

हालांकि, उपरोक्त बताए गए शलभासन के स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिए उसे सही तरीके के साथ करना जरूरी है। यदि आप पहली बार शलभासन अभ्यास करने जा रहे हैं या फिर आपको इसकी सही विधि की जानकारी नहीं है तो किसी अच्छे योग प्रशिक्षक से मदद लेने की सलाह दी जाती है।

 

शलभासन करने का तरीका (Steps to do Locust pose)

 

शलभासन से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिए इस योगासन को करने का सही तरीका पता होना जरूरी है। आप निम्न चरणों के माध्यम से शलभासन सीख सकते हैं -

·                     Step 1 - मैट पर पेट के बल लेट जाएं, माथे को मैट पर रखें और बाहों के अपनी बगल में ही रखें

·                     Step 2 - दोनों टांगों में थोड़ी सी दूरी बना लें और गहरी सांस लेते हुए सिर को उठाएं

·                     Step 3 - इसके बाद सांस छोड़ते हुए दोनों हाथों और छाती को हवा में उठाएं

·                     Step 4 - हाथों को ऊपर उठाने के दौरान हथेलियों को नीचे की तरफ ही रखें

·                     Step 5 - जांगों की मदद से पैरों टांगों को थोड़ा और ऊपर उठाएं और इसके साथ हाथों को भी ऊपर उठाने की कोशिश करें

·                     Step 6 - इस मुद्रा में आप अपने पेडू और छाती की ही मैट से स्पर्श करते हैं और बाकी शरीर आपका हवा में होता है।

 

इस मुद्रा को आप एक मिनट तक करके रख सकते हैं और उसके बाद सांस छोड़ते हुए शरीर के उठाए गए अंगों को धीरे-धीरे नीचे ले आएं। इसके बाद कुछ देर तक शरीर को आराम करने दें और फिर यही प्रक्रिया दोहराएं

 

शलभासन के दौरान सावधानियां (Precautions during Locust pose)

 

शुरुआती योगासन सीखने वालों के लिए शरीर को हवा में रखना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, इसलिए वे इस योग मुद्रा के दौरान अपने हाथों को जमीन पर ही रख सकते हैं और सिर्फ उतना ही शरीर उठा सकते हैं जितना उनसे संभव हो पाता है।

 

शलभासन के दौरान कोई भी क्रिया बलपूर्वक करने की कोशिश करें और ही तेजी या झटके के साथ शरीर के अंगों को उठाएं। ऐसा करने से शरीर के कुछ हिस्सों में दर्द हो सकता है।

 

शलभासन कब करें (When not to do Locust pose)

 

यदि आपको स्वास्थ्य से संबंधी निम्न समस्याएं हैं, तो आपको शलभासन करने की सलाह दी जाती है -

·                     गर्दन, पीठ, पेट, टांग या बांह में गंभीर दर्द

·                     उच्च या निम्न रक्तचाप

·                     हृदय या श्वास संबंधी रोग

·                     कमजोरी, थकान या सुस्ती महसूस होना

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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