Monday, July 18, 2022

त्रिगुण सूक्ष्म और अदृश्य हैं, स्थूल नहीं है तथा केवल सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय अथवा छठवीं ज्ञानेंद्रिय (सूक्ष्म संवेदी क्षमता) द्वारा ही अनुभव किए जा सकते हैं। सात्विक गुणों से युक्त व्यक्ति का उत्थान, राजसिक गुणों से युक्त व्यक्ति की मध्यम गति अर्थात् उत्थान और पतन दोनों ही संभव हैं तथा तामसिक गुणों से युक्त व्यक्ति का केवल पतन ही होगा। सभी जीव भूतों में ये गुण ही कर्ता हैं। इन गुणों से ऊपर उठकर जो व्यक्ति परमात्मा को देखता है, वही व्यक्ति गुणातीत कहलाता है। वही व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त होता है। 

प्रत्येक प्राणी या जीव अपने अन्दर पाए जाने वाले तीन गुणों के कारण ही जन्म-मृत्यु के बन्धन में जकड़ा रहता और लगातार साँप-सीढ़ी के खेल की तरह 84,00,000 योनियों में भटकता रहता है। ये त्रिगुण प्रकृति के अंतर्गत मानी जाने वाली तीन प्रकार की वृत्तियाँ सत्व, रज और तमया भाव  हैं जो कि मनुष्यों, जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों आदि में पायी जाती हैं।

सत्त्व गुण निर्मल (स्वच्छ) होने के कारण प्रकाशक और निर्विकार है। परन्तु वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान आसक्ति से देही को बाँधता है और गुणातीत होते हुए भी सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति उत्पन्न करता है। यह ज्ञान, प्रकाश, वैराग्य, उदारता, स्वच्छता, निर्मलता, निवृत्ति, निस्पृहता को प्रकट करता है।

सत्त्व गुण के दो विकार सुख और ज्ञान सुख में आसक्ति होने पर साधक भगवान् की ओर नहीं बढ़ता। ज्ञान का अहंकार  ऐसा करने से रोकता है। मनुष्य सोचता है कि उसे जो चाहिये था, वो तो उसे मिल हो गया और अब हासिल करने को शेष बचा ही क्या है?!

सात्विकता :: पवित्रता तथा ज्ञान-जाग्रत अवस्था, प्रकाशमान, सदैव सम स्थिति में रहना, भीतर ज्ञान होना, बाहर से बिलकुल शान्त। सात्विक, किसी फल अथवा मान-सम्मान की अपेक्षा अथवा स्वार्थ के बिना समाज की सेवा करना। सत्त्व गुण सबसे सूक्ष्म तथा अमूर्त (intangible) है। सत्त्व गुण दैवी तत्त्व के सबसे निकट है। सतोगुणी व्यक्ति, ज्ञानरुपी प्रकाश से प्रकाशमान रहता है। व्यक्ति यदि सात्त्विक हो, तो सत्त्व प्रधान कर्म को ऊर्जा प्रदान करता है। इसलिए सत्त्व प्रधान व्यक्ति के लक्षण हैं :- प्रसन्नता, संतुष्टि, धैर्य, क्षमा करने की क्षमता, अध्यात्म के प्रति झुकाव इत्यादि।

RAJO GUN रजो गुण :: रजो गुण का विकार मनुष्य को कर्म और उसके फल की प्राप्ति में उलझा देता है। तृष्णा, अभिलाषा, उमंग, हवस, लालसा, कामना, आकांक्षा और आसक्ति को पैदा करने वाला रजोगुण राग स्वरूप है और वह कर्मों की आसक्ति से देही-जीवात्मा को बाँधता है। यह लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मों का आरम्भ, अशान्ति, स्पृहा (किसी अच्छे काम, चीज या बात की प्राप्ति अथवा सिद्धि के लिए मन में होनेवाली अभिलाषा इच्छा या कामना), चञ्चलता, सांसारिक भोग और संग्रह की प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है।

राजसिकता :: क्रिया तथा इच्छाएं-स्वप्न अवस्था, कर्मठता, सदैव कार्यरत रहना, सदैव सक्रिय रहना, सम्पूर्ण समय केवल भाग-दौड, बाहर और भीतर दोनों तरफ से अशांत। स्वयं के लाभ तथा कार्य सिद्धि हेतु जीना। रजो गुण सत्त्व तथा तम को उर्जा प्रदान करता है तथा कर्म करवाता है।

त्रिगुणों में सबसे कनिष्ठ-हीन तम गुण है। तामसिक गुणों से युक्त व्यक्ति बाहर से शान्त नज़र आने के कारण कभी कभी सतोगुणी होने का भ्रम पैदा करता है। तामसिक गुणी व्यक्ति भीतर से अज्ञानी रहता है। तम प्रधान व्यक्ति, आलसी, लोभी, सांसारिक इच्छाओं से आसक्त रहता है। तम तामसिक प्रधान कर्म को ऊर्जा प्रदान करता है।

तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और वह प्रमाद, आलस्य अनावश्यक निद्रा और  मूढ़ता के द्वारा देह के साथ अपना सम्बन्ध मानने वालों को बाँधता है।

यह ज्ञान नेत्र बन्द करके व्यक्ति को अहंकार-प्रमाद और अज्ञान की दलदल में ढ़केल देता है। मनुष्य मूढ़ता, मूर्खता, अविवेक के आश्रय हो जाता है और सोचने-समझने की शक्ति भी खो बैठता है। वह आलस्य और नींद के अधीन हो है।

इससे प्रभावित मनुष्य अन्य 84,00,000 योनियों में विचरने वाले पशु-पक्षी, जीव-जन्तुओं के समान खा-पीकर, मैथुन और सोने तक ही सीमित रह जाता है। तमोगुण प्रमाद, आलस्य और  निद्रा के द्वारा देह धारियों को बाँधता है, जिससे वे करने लायक शुभ कर्म नहीं करते और करने लायक अशुभ कर्मों को करते हैं। आलस्य और नींद उसे घेरे रहते हैं। यह साँसारिक अथवा आध्यात्मिक उन्नति नहीं होने देता।

अज्ञानता तथा निष्क्रियता-सुषुप्तावस्था, आलस्य, प्रमाद, सदैव निद्रा में रहना, भीतर केवल अज्ञान, बाहर से बिलकुल शान्त, आलस्य धारण किये हुए। दूसरों को अथवा समाज को हानि पहुँचाकर स्वयं का स्वार्थ सिद्ध करना।

तमस् गुण के प्रधान होने पर व्यक्ति को सत्य-असत्य का कुछ पता नहीं चलता, वो अज्ञान के अंधकार (तम) में रहता है अर्थात कौन सी बात उसके लिए अच्छी है वा कौन सी बुरी ये यथार्थ उसे पता नहीं चलता और इस स्वभाव के व्यक्ति को ये जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती।

भ्रम का कारण तमस होता है, अज्ञान द्वारा जन्मी सभी चीजों को यह दास बना लेता है; लापरवाही असावधानता और निद्रालुता अज्ञान, जड़ पदार्थ की एक विशिष्ट स्थिति, लापरवाही और भ्रम भी है; जब इनका जन्म होता है, तब तमस हावी हो जाता है। जब किसी की मृत्यु राजस में होती है, तब वह उस कार्य को पूरा करने के लिए फिर से जन्म लेता है: उसी तरह तमस में मृत्यु होने के बाद उसका जन्म एक जानवर के कोख से होता है।

सत्त्व गुण सुख में और रजोगुण कर्म में लगाकर मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है। परन्तु तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में लगाकर मनुष्य पर विजय करता है। 

रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है और वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है। 

किन्हीं दो गुणों को दबा देने से तीसरा गुण उभरने लगता है। प्रारम्भ में मनुष्य रजो गुण और तमो गुण पर काबू करे। तत्पश्चात वह सत्त्व गुण का निरन्तर अभ्यास करे। सत्त्व गुण के अभ्यास में सुख में रमे और ज्ञान के अहंकार से सावधान रहकर आगे बढ़े और सामाजिक, सांसारिक दायित्वों-कर्तव्यों को निस्पृहता साथ निर्वाह करता रहे और अन्त में केवल और केवल अनन्य भक्ति में मन रमाये।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः। 

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.5 

हे महाबाहो! प्रकृति से उत्पन्न होनेवाले सत्व (Purity, virtuousness, enlightenment), रज (Desires, action and passion) और तम (Ignorance-darkness, laziness and inertia), ये तीनों गुण अविनाशी देही (जीवात्मा) को बाँध देते हैं।

सत्व, रज और तम आदि तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। इन तीनों गुणों के संयोग से अनन्त ब्रह्माण्ड और सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं। ये तीनों गुण अविनाशी देही-शरीरी आत्मा को देह-शरीर में बाँध देते हैं। शरीर को अपना समझना, मेरा, मैं, मेरे लिये ही प्राणी को जन्म-मरण के बन्धनों में जकड़ देते हैं। देह में तादात्म्य, ममता और कामना होने पर ही तीनों आत्मा-पुरुष को शरीर-प्रकृति में बाँधते हैं। 

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्। 

सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.6 

हे पाप रहित अर्जुन! उस गुणों में सत्त्व गुण निर्मल (स्वच्छ) होने के कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान आसक्ति से देही को बाँधता है। 

Bhagwan Shri Krashn called Arjun Sinless-free from sins! HE said that amongest the three characteristics the Sattv was free from vices-impurities, guiding-illuminating and defectless. The Sattv Gun binds the soul with fetters (बेड़ी, जंजीर, shackle) of desire for comfort and enlightenment.

सत्त्व, रज और तम गुणों में सत्त्व गुण मल रहित है और परमात्म तत्व का ज्ञान कराने में सहायक है। यह प्रकाशक-मार्गदर्शक है। प्रकृति का गुण होने से इसमें शुद्धता के साथ-साथ मलिन सत्त्व भी है, जिसका उद्देश्य सांसारिक भोग  संग्रह है। शुद्ध तत्व परमात्मा की ओर ले जाता है। भोग और सग्रह मनुष्य को अहंकार, मान-बड़ाई, धन-सम्पत्ति आदि के द्वारा संसार से बाँध  देते हैं। फिर भी क्योंकि यह परमात्म तत्व में सहायक है, इसलिए भगवान् ने इसे विकार रहित कहा है। अन्तःकरण में सात्विक वृत्ति से सुख और शान्ति मिलती है, जिसमें सुख और शान्ति के प्रति आसक्ति को, बाँधने वाला कहा गया है। सत्त्व गुण की अधिकता होने पर मनुष्य को सत्त्व, रज और तम की वृत्तियों, विकारों का स्पष्ट ज्ञान होने लगता है और साधक को ऐसी आश्चर्य जनक जानकारियाँ प्राप्त होने लगती हैं जिनका ज्ञान या आभास उसे पहले नहीं था। तब उसे लगता है कि यह ज्ञान कायम रहे। ज्ञान के प्रति यह आसक्ति भी बाँधने वाली है। सुख-भोग और ज्ञान के प्रति यह आसक्ति रजोगुण है और बाँधने वाली है। अतः साधक का लक्ष्य सुख-भोग और ज्ञान नहीं है, अपितु ये केवल परमात्मा की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं। समयानुसार सतोगुणी को स्वयं ही सुख-भोग और ज्ञान के प्रति अरुचि होने लगती है और वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।  

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। 

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.7 

हे कुन्तीनन्दन! तृष्णा (अभिलाषा, उमंग, हवस, लालसा, कामना, आकांक्षा; thirst, desire, craving, longing, greed) और आसक्ति को पैदा करने वाले रजोगुण को तुम राग स्वरूप समझो। वह कर्मों की आसक्ति से देही-जीवात्मा को बाँधता है।

रजोगुण वस्तु, व्यक्ति, स्थान, परिस्थिति, घटना, क्रिया आदि के प्रति तृष्णा, राग, आसक्ति उत्पन्न करता है। सत्त्व गुण गुणातीत होते हुए भी, सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति उत्पन्न करता है। आसक्ति बन्धनकारी है, सत्त्व गुण नहीं। अतः राग, संकल्प, कर्म ही रजोगुण के प्रमुख स्वरूप हैं। यह रजोगुण कर्मों के प्रति आसक्ति से देह से सम्बन्ध मानने वाले देही को बाँधता है। अतः मनुष्य को कर्तव्य कर्म निष्काम भाव से संग्रह, सुख भोग की आकांक्षा को त्याग कर, करने चाहिये।  

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। 

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.8 

और हे भरत वंशी अर्जुन! सम्पूर्ण देहधारियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तुम अज्ञान से उत्पन्न होने समझो।वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा देह के साथ अपना सम्बन्ध मानने वालों को बाँधता है। 

सत्त्व, रजोगुण की अपेक्षा तमोगुण अत्यधिक निकृष्ट है। तमोगुण अज्ञान, नासमझी, मूर्खता से उत्पन्न होता है। समस्त देहधारी इससे मोहित हो जाते हैं। सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान उन्हें नहीं रहता। अविवेक उन्हें राजस सुख-भोग और संग्रह से भी दूर रखता है। सात्विक सुख तक ऐसा व्यक्ति पहुँचता ही नहीं है। मनुष्य के आलावा अन्य हीन प्राणी तो तमोगुण के प्रभाव से स्वाभाविक रूप से मोहित हैं। तामस गुण से प्रभावित मनुष्य अन्य 84,00,000 योनियों में विचरने वाले पशु-पक्षी, जीव-जन्तुओं के समान खा-पीकर सोने तक ही सीमित रह जाता है। तमोगुण प्रमाद, आलस्य और  निद्रा के द्वारा देह धारियों को बाँधता है, जिससे वे करने लायक शुभ काम नहीं करते और करने लायक अशुभ कर्मों को करते हैं। आलस्य और नींद उसे घेरे रहते हैं। तमोगुण उसकी साँसारिक अथवा आध्यात्मिक उन्नति नहीं होने देता। 

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत। 

ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.9 

हे भरत वंशोद्भव अर्जुन! सत्त्व गुण सुख में और रजोगुण कर्म में लगाकर मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है। परन्तु तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में लगाकर मनुष्य पर विजय करता है। 

सत्त्व गुण के दो विकार सुख और ज्ञान में आसक्ति होने पर साधक भगवान् की ओर नहीं बढ़ता। ज्ञान का अहंकार  ऐसा करने से रोकता है। मनुष्य सोचता है कि उसे जो चाहिये था, वो तो उसे मिल हो गया और अब हासिल करने को शेष बचा ही क्या है?! रजो गुण का विकार मनुष्य को कर्म और उसके फल की प्राप्ति में उलझा देता है। तमोगुण तो उसके ज्ञान नेत्र बन्द करके उसे अहंकार-प्रमाद और अज्ञान की दलदल में ढ़केल देता है। मनुष्य मूढ़ता, मूर्खता, अविवेक के आश्रय हो जाता है और सोचने-समझने की शक्ति भी खो बैठता है। वह आलस्य और नींद के अधीन हो है।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।

रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.10

हे भरत वंशोद्भव अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है और वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है। 

रजो गुण की वृत्तियाँ :: लोभ, प्रवृत्ति, नये-नये कर्मों का आरम्भ, अशान्ति, स्पृहा (किसी अच्छे काम, चीज या बात की प्राप्ति अथवा सिद्धि के लिए मन में होनेवाली अभिलाषा इच्छा या कामना, Ambition, craving, eagerness, desire, covetousness), चञ्चलता, सांसारिक भोग और संग्रह। 

तमो गुण की वृत्तियाँ :: प्रमाद, आलस्य, अनावश्यक निद्रा, मूढ़ता। 

सत्त्व गुण की वृत्तियाँ :: ज्ञान, प्रकाश, वैराग्य, उदारता, स्वच्छता, निर्मलता, निवृत्ति, निस्पृहता।  

उपरोक्त किन्हीं दो गुणों को दबा देने से तीसरा गुण उभरने लगता है। प्रारम्भ में मनुष्य रजो गुण और तमो गुण पर काबू करे। तत्पश्चात वह सत्त्व गुण का निरन्तर अभ्यास करे। सत्त्व गुण के अभ्यास में सुख में रमे और ज्ञान के अहंकार से सावधान रहकर आगे बढ़े और सामाजिक, सांसारिक दायित्वों-कर्तव्यों को निस्पृहता साथ निर्वाह करता रहे और अन्त में केवल और केवल अनन्य भक्ति में मन रमाये। 

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। 

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.11 

जब इस मनुष्य शरीर में सब इन्द्रियों और अन्तःकरण में, प्रकाश (स्वच्छता) और विवेक प्रकट हो जाता है, तब यह जानना चाहिये कि सत्त्व गुण बढ़ा हुआ है। 

प्रकाश का अर्थ है निद्रा, आलस्य और प्रमाद का रहना। विवेक का अर्थ है सही-गलत, सत्-असत्, कर्तव्य-अकर्तव्य, लाभ-हानि, हित-अहित, ग्राह्य-अग्राह्य का यतार्थ ज्ञान हो जाना। मनुष्य  के अन्दर त्रिगुण प्रकृति के रूप में मौजूद रहते हैं। इन तीनों में से जब सत्त्व गुण बढ़ जाता है तो रजो गुण और तमो गुण दब जाते हैं और मनुष्य के सभी अंगों और अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश और विवेक जाग्रत हो जाता है। मनुष्य को सही-गलत, सत्-असत्,कर्तव्य-अकर्तव्य, लाभ-हानि, हित-अहित का यतार्थ ज्ञान होने लगता है। मन में निर्मलता, अन्तःकरण की स्वच्छता, और विवेक शक्ति का प्रकट होना केवल मानव शरीर में ही संभव है, अन्य शरीरों में नहीं। इस स्थिति में साधक को यह अहसास रहना चाहिये कि उसमें ज्ञान का अहंकार आये। वो सत्त्वगुण के कार्य प्रकाश और ज्ञान को अपना गुण कभी माने। उसे स्वयं को सात्विक समझकर सर्वथा निर्विकार, अपरिवर्तन शील मानना चाहिये। मनुष्य के सभी अंगों और अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश और विवेक जाग्रत होने पर राग स्वतः दूर हो जाता है और वैराग्य प्रकट हो जाता है। अशान्ति का स्थान शान्ति ले लेती है। लोभ की जगह उदारता जाती है। मनुष्य निष्काम हो जाता है। भोग-संग्रह के लिए प्रयास बन्द हो जाते हैं। सभी कार्य सुचारु रूप से होने लगते हैं। 

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। 

रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.12 

हे भरत वंशियों  में श्रेष्ठ अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और स्पृहा (किसी अच्छे काम, चीज या बात की प्राप्ति अथवा सिद्धि के लिए मन में होनेवाली अभिलाषा-इच्छा या कामना, Ambition, craving, eagerness, desire, covetousness) अदि वृत्तियाँ पैदा होती हैं। 

आवश्यकता से अधिक किसी भी चीज को इक्कट्ठा करने-संग्रह करने की प्रवृति लोभ है। राग-द्वेष रहित होकर किसी कार्य में लगना प्रवर्ति नहीं है। राग-द्वेष, सुख की चाह, आराम, धन-सम्पदा को जरूरत से ज्यादा एकत्र-संग्रह करना दोष पूर्ण प्रवर्ति है। संसार में भोग-संग्रह, नाम, इज्जत, मान, प्रशंसा, धन की कामना के साथ कोई नया कार्य, उद्यम आरम्भ करना प्रवर्ति है। मनुष्य जन्म में परमात्मा प्राप्ति ही उद्देश्य होना चाहिये। कामना और संकल्प के साथ कोई कार्य नहीं होना चाहिये। कर्म आसक्ति रहित हो। इच्छा से युक्त कर्म की असफलता से अशान्ति प्राप्ति होती है। किसी भी कार्य, चीज या बात की प्राप्ति अथवा सिद्धि के लिए मन में होने वाली अभिलाषा-इच्छा या कामना स्पृहा है, जिसका त्याग आवश्यक है। रजो गुण के बढ़ने पर प्रवृतियाँ, अभिलाषाएँ, कामनाएँ बढ़ती हैं और इनकी पूर्ति होने पर अशान्ति पैदा होती है। मनुष्य को इन वृत्तियों को या तो सर्वथा मिटा देना चाहिये अथवा इनके प्रति उदासीन हो जाना चाहिये। 

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। 

तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.13 

हे कुरु नन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह आदि वृतियाँ भी पैदा होती हैं। 

तमोगुण के बढ़ने के साथ ही अन्तःकरण और इन्द्रियाँ मलिन हो जाते हैं और व्यक्ति में सोचने समझने, विचार करने की शक्ति प्रायः लुप्त हो जाती है और विवेक नहीं रहता। काम करने के स्थान पर खाली पड़े रहना अच्छा लगता है। समय व्यर्थ की बातों में गंवाना, अहङ्कार का बढ़ना, व्यर्थ की तकरार आदि दुर्गुण मनुष्य में जाते हैं।अपने आपसे, घर से, नींद से और आलस्य से मनुष्य लिप्त हो जाता है। धन को व्यर्थ करना, नशा, गलत सङ्गति में रहने के साथ-साथ मूढ़ता भी जाती है। राग से क्रोध और मोह की वृत्ति  पैदा होती है और मनुष्य का पतन हो जाता है। 

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।

तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.14

जिस समय सत्त्व गुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह उतमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है। 

निर्मल प्रवृत्ति के व्यक्तियों में सत्त्व गुण लगातार बढ़ता रहता है। सत्कार्य, सदाचार, पुण्यकार्य, समाजसेवा, दीन-दुःखी की मदद्, परमात्मा की भक्ति, वर्णाश्रम धर्म का पालन, तीर्थ यात्रा इत्यादि ऐसे कार्य हैं, जिनसे मनुष्य की निवृत्ति होती है। ऐसे वक़्त यदि देहान्त होता है, तो मनुष्य को उत्तम-निर्मल लोकों की प्राप्ति होती और वहाँ से लौटने पर पुण्यात्माओं के घर जन्म मिलता है। विवेकवान पुरुष उत्तमवेत्ता है। सत्त्वगुण को अपना मानकर उसमें रमण करे और भगवान् की सम्मुखता रहे, तो सात्विक गुण से भी असंग-गुणातीत होकर भगवान् के परमधाम को चला जायेगा, अन्यथा सत्त्वगुण का सम्बन्ध रहने पर वह ब्रह्मलोक तक के ऊँचे लोकों को चला जायेगा। ब्रह्मलोक तक के लोकों में तो सापेक्ष निर्मलता है, परन्तु भगवान् के परमधाम में निरपेक्ष निर्मलता है। 

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। 

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.15 

रजोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मनुष्य कर्म संगी मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है। 

मरते समय मनुष्य में यदि रजो गुण यथा :- लोभ, स्पृहा, अशान्ति, प्रवृत्ति आदि बढ़े हुए हैं, तो उसे कर्मों में आसक्ति रखने वाली मनुष्य योनि में ही जन्म मिलेगा। शुभ कर्म करने वाला, अच्छे संसार वाला व्यक्ति फिर से उन्हीं संस्कारों के साथ जन्म लेगा। इस स्थिति में उसे विवेक की प्राप्ति भी होती है, जिससे वह सत्संग, स्वाध्याय कर सकता है। यदि मनुष्य में मरते वक्त तमो गुण की प्रधानता यथा :- प्रमाद, अप्रकाश, मोह, है तो वह कीट-पतंग, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता, आदि हीन योनियों में पहुँचेगा। इसीलिये मनुष्य को अपने जीवन का अन्तिम समय भगवत भक्ति, भजन-कीर्तन, प्रभु का चिन्तन-मनन, ध्यान-समर्पण में लगाना चाहिये। 

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। 

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.16 

विवेकी पुरुषों ने शुभ कर्म का फल सात्विक निर्मल, राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान-मूढ़ता बताया है। 

कर्म जिस भावना से किया गया है, वो वही रुप ले लेगा। स्वच्छ, निर्मल परोपकार की भावना से किया गया कार्य जिसके पीछे स्वार्थ और फलेच्छा नहीं है, सात्विक फल प्रदान करता है। रागात्मकता से ग्रस्त कार्य, भोग-विलास, संचय आदि की प्रवृत्ति से ग्रस्त होते हैं। इनमें से कुछ कर्म स्वर्ग की लालसा से किये जाते हैं। अन्ततोगत्वा इनका परिणाम सिवाय दुःख के कुछ नहीं होता। तमोगुण मोह से लिप्त है, जिसकी परिणति हिंसा, हानि, पाप, हीन योनियों में जन्म लेना है। सात्विक कर्म से कभी दुःख पैदा नहीं होता, राजसिक कर्म से सुख पैदा नहीं होता और तामसिक मनोवृति कभी विवेक जाग्रत नहीं होने देती। जिसकी मनोवृत्ति और भावना जैसी होगी मनुष्य जीवन के अवसान काल में उसके अनुरुप ही चिंतन करेगा और उसके अनुसार ही जन्म अथवा मुक्ति प्राप्त करेगा।

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। 

प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.17 

सत्त्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं। तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं। 

सत्त्व गुण से ज्ञान-विवेक जाग्रत होता है, जो मनुष्य को सुकृत, सत्कर्म करने को प्रेरित करता है, जिनके परिणाम स्वरूप वह  सात्विक और निर्मल हो जाता है। ऐसे मनुष्य को परमात्मा के गुणातीत स्वरूप का बोध हो जाता है। रजो गुण लोभ पैदा करता है, जिससे मनुष्य को दुःखों की प्राप्ति होती है। तमो गुण से प्रमाद-नींद और आलस्य, मोह एवं अज्ञान उत्पन्न होते हैं, जो विवेक का नाश करने वाले हैं। जरुरत से ज्यादा सोना आलस्य को जन्म देता है और निषिद्ध है। 

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। 

जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.18 

सत्त्व गुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्व लोकों जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्यु लोक में जन्म लेते हैं और निंदनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं। 

जीवन यापन, रहन-सहन में सत्त्वगुण की प्रधानता होने से प्राणी स्वर्ग, ब्रह्मलोक जैसे उच्च लोकों में जाता है। धर्म का पालन, तीर्थ, जप-तप, दान-पुण्य, लोगों की निस्वार्थ सहायता, कर्म में फलेच्छा रखना आदि सत्त्व गुण के अन्तर्गत आते हैं। संग्रह, भोग, ऐशो-आराम, स्वार्थ, ममता-कामना, फलेच्छा मनुष्य को पृथ्वी लोक में पुनर्जन्म प्रदायक हैं। अशुद्ध आचरण, निंदनीय कर्म, आराम तल्वी, जरूरत से ज्यादा सोना, दूसरों को दुःख देना, चोरी, डकैती, हत्या, कपट, धोकाधड़ी, झूँठ, आतंक पैदा करना आदि प्राणी को स्वतः नर्क और अधोगति देते हैं। मनुष्य मरकर भी मुक्त होकर भूत-प्रेत, पिशाच, नर्क, हीन-निंदनीय योनियों में, इसी कारण पहुँचता है और अत्यधिक कष्ट पाता है। उसकी मुक्ति में अनेकों वर्ष और युग तक व्यतीत हो जाते हैं। फिर भी यदि मृत्यु के वक्त यदि वह मनुष्य योनि का चिन्तन कर रहा होगा तो उसे मनुष्य योनि में जन्म लेकर भयंकर, दुःख-दर्द, पीड़ा, हारी-बीमारी का सामना करना पड़ेगा। अतः मनुष्य को सात्विक भोजन, सात्विक आचार-विचार-मंत्रोपचार, शुद्ध स्थान-संगति का पालन करना चाहिये। 

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। 

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.19 

जब विवेकी, विचारवान कुशल, व्यक्ति तीनों गुणों के अलावा अन्य किसी को कर्ता के रुप में नहीं देखता और अपने को गुणों से पर-दूर अनुभव करता है, तब वह मेरे सत्स्वरूप को प्राप्त होता हो जाता है। 

समस्त क्रियाएँ गुणों के परस्पर क्रिया करने से ही होती हैं। गुणों के अलावा अन्य कोई कर्ता है ही नहीं। ये गुण जिससे प्रकाशित होते हैं, वह तत्त्व, गुणों से परे-दूर है। गुणों से अलग होने के कारण वह कभी इनमें लिप्त नहीं होता और क्रियाओं का उस पर कोई असर नहीं होता। जो व्यक्ति इस तथ्य को विचार-मनन के द्वारा जान-समझ लेता है, वह अपने आपको गुणों से पर-अतीत, असम्बद्ध, निर्लिप्त अनुभव करता है। गुण परिवर्तन शील है और स्वयं-आत्मा में कभी कोई परिवर्तन होता ही नहीं। जो इस तथ्य को मान लेता है, वो भगवत्स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। 

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.20 

देहधारी-विवेकी मनुष्य, देह को उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रुप दुःखों से रहित हुआ, अमरता का अनुभव करता है। 

देह-शरीर की उत्पत्ति प्रकृति के त्रिगुण से ही होती है। विचार शील मनुष्य इन गुणों का अतिक्रमण करके देह से अपना सम्बन्ध नहीं मानता। शरीर धारी होने से ही उसे देही कहा गया है। जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था शरीर के गुण हैं। जब विचारशील व्यक्ति शरीर से ही सम्बन्ध नहीं मानता, तो दुःख कैसा? जो गुणों से निर्लिप्तता का अनुभव कर लेता है, उसे अमरता का अहसास हो जाता है। देही-आत्मा अमर है, देह-शरीर नहीं। 

अर्जुन उवाच :- 

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। 

किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.21 

हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से युक्त है और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है

अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से पूछा कि जो व्यक्ति प्रकृति जनित गुणों का अतिक्रमण कर चुका है, उसके लक्षण क्या हैं, उसमें क्या विलक्षणता पैदा हुई है? उसका आचरण, व्यवहार, खान-पान, रहन-सहन, उठना-बैठना  कैसा होता है, उसकी दिनचर्या कैसी होती है? इन तीनों गुणों को अतिक्रमण करने का उपाय क्या है?

श्रीभगवानुवाच :-

प्रकाशं प्रवृत्तिं मोहमेव पाण्डव। 

द्वेष्टि संप्रवृत्तानि निवृत्तानि काङ्क्षति॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.22 

हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृति तथा मोह, ये सभी अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जाएँ तो भी गुणातीत मनुष्य, इनसे द्वेष नहीं करता और ये सभी निवृत्त हो जाएँ तो इनकी इच्छा नहीं करता। 

इन्द्रियों और अन्तःकरण की स्वच्छता, निर्मलता ही प्रकाश है। इन्द्रियों के द्वारा शब्दादि विषयों का ज्ञान होता है, मन से मनन होता है और बुद्धि से निर्णय  होता है। सत्वगुण में प्रकाशवृत्ति ही मुख्य है, क्योंकि जब तक इन्द्रियों और अन्तःकरण में प्रकाश नहीं आता, स्वच्छता-निर्मलता नहीं आती और तब तक विवेक जाग्रत नहीं होता। रजोगुण के साथ सम्बन्ध लोभ, प्रवृत्ति, रागपूर्वक कर्मों का प्रारंभ होना, अशान्ति और स्पृहा पैदा करता रहता है। गुणातीत मनुष्य में रजोगुण प्रभावहीन हो जाता है, यद्यपि वह आसक्ति, कामना रहित प्रवृति, निष्काम भाव से नित्यकर्म और अन्य क्रियाएँ करता रहता है। राग और क्रिया में राग दुःखों का कारण है। गुणातीत व्यक्ति में राग भी खत्म हो जाता है। गुणातीत मनुष्य में सत्त-असत्त, नित्य-अनित्य, कर्तव्य-अकर्तव्य का मोह तो रहता ही नहीं है। तथापि व्यवहार में गलती-भ्रम हो सकता है। सत्त्वगुण का प्रकाश, रजोगुण की प्रवृत्ति और तमोगुण का मोह; इन तीनों से अच्छी तरह प्रवृत्त होने पर भी गुणातीत व्यक्ति, इनसे द्वेष नहीं करता और इनसे निवृत्त होने पर इनकी इच्छा नहीं करता। साधक वृत्तियों को अच्छा, बुरा या अपने में माने, क्योंकि ये तो आने-जाने वाली हैं, जबकि स्वयं, आत्मा-देही निरन्तर है। वृत्तियों का सम्बन्ध प्रकृति के साथ और मनुष्य-आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा के साथ है। 

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो विचाल्यते। 

गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.23

जो गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, इस भाव से जो अपने स्वरूप  स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता वह उदासीन की तरह स्थित है।  

गुणातीत मनुष्य-साधक उदासीन है, वह किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। वह इस संसार को और परमात्मा को एक ही दृष्टि से देखता है। संसार की स्वतंत्र सत्ता है ही नहीं। यह संसार ईश्वर की सत्ता से ही चालित है। वह साधक अपने अन्तःकरण में सत्त्व, रज और तम गुणों वाली वृत्तियों से विचलित नहीं होता, क्योंकि परमात्मतत्व का प्रभाव उसे निरंतर जाग्रत रखता है। वह जानता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं अर्थात समस्त क्रियाएँ गुणों के परस्पर मिलने से होती हैं। यह जानकर ही वह अपने स्वरूप में निर्विकार भाव से स्थित है। गुणातीत व्यक्ति स्वयं कोई चेष्टा नहीं करता। 

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.24

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।

सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः उच्यते॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.25

जो धीर मनुष्य दुःख-सुख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढ़ेले, पत्थर और सोने में सम रहता है; जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है, जो अपनी निंदा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है और जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

नित्य-अनित्य, सार-असार, आदि के तत्व को जानकर स्वतः सिद्ध स्वरूप में स्थित होने से गुणातीत मनुष्य धैर्यवान (Patient) कहलाता है। अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ ही सुख-दुःख हैं। जो इन्द्रियों, शरीर और मन के अनुकूल है, वह सुख है। गुणातीत मनुष्य दोनों स्थितियों में सम-तटस्थ बना रहता है। वह सदैव अपने स्वरूप (आत्मभाव) में स्थित रहता है। स्वर्ण, मिट्टी का ढेला, पत्थर या पारस उसके लिए समान हैं। सोने और पारस का ज्ञान होते हुए भी वह इनके प्रति उदासीन बना रहता है। सिद्धि-असिद्धि या उनका तात्कालिक प्रभाव उसके लिए बेमानी है। कोई उसकी बुराई करे या बड़ाई उसे फर्क नहीं पड़ता। उसे निन्दकों-आलोचकों से द्वेष और प्रसंशा करने वालों के प्रति राग नहीं होता। मान-अपमान में वह शांत-प्रतिक्रिया रहित बना रहता है। मित्र या शत्रु जैसे शब्द उसके लिए नहीं है क्योंकि वह सभी से तारतम्य, समान व्यवहार करता है। जो मनुष्य प्रकृति जन्य गुणों से दूर-उदासीन-सम-तटस्थ है, वह गुणातीत है। 

मां योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। 

गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥श्रीमद्भगवद्गीता 14.26 

और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है। 

भगवान् ने गुणातीत (निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति) होने का उपाय भक्ति बताया है। साधक को यदि ज्ञान योग अथवा कर्म योग का सहारा भी हो तो भी वह मात्र भक्ति योग से परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। केवल भगवान् का ही आश्रय, सहारा, सम्बल, आशा, बल, विश्वास, भक्ति मार्ग ही साधक के लिए पर्याप्त है। जो साधक अनन्य भाव से प्रभु की शरण में है, उसे गुणों के अतिक्रमण का प्रयास नहीं करना पड़ता, प्रभु स्वयं ही उसका मार्ग सरल-निष्कंटक बना देते हैं। 


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